Rajendra Devray / Fri, Sep 12, 2025 / Post views : 34

नालछा। कुशवाह समाज धर्मशाला में चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के पांचवें दिवस पर भागवताचार्य पं. रुपेश अग्निहोत्री (शास्त्री) ने कहा कि सृष्टि के प्रारंभ से ही जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म प्रबल होता है, तब-तब भगवान पापियों का संहार करने और धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेते हैं। भविष्य में भी जब संसार में पाप का अंधकार फैलेगा, तब ईश्वर अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए बताया कि प्रभु की प्रत्येक लीला मानव जीवन को प्रेरणा देने वाली है। बाल्यकाल में माखन चुराने के कारण वे माखन चोर कहलाए, गायों के पालन से गोपाल नाम मिला तथा गोवर्धन पर्वत धारण करने पर वे गोवर्धनधारी नाम से विख्यात हुए।
पं. अग्निहोत्री ने गोवर्धन पर्वत पूजन का महत्व बताते हुए कहा कि यह पर्वत केवल एक शिला नहीं, बल्कि आस्था और संरक्षण का प्रतीक है। कथा स्थल पर गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक निर्माण कर विधिवत पूजन एवं परिक्रमा की गई।
*कथा के दौरान पंडित रुपेश अग्निहोत्री ने धार्मिक परंपराओं और नियमों का उल्लेख करते हुए बताया कि -*
प्रणाम के नियम : ब्राह्मण दामाद, बेटी और संतों से प्रणाम नहीं करवाना चाहिए।
तिलक : ब्राह्मण को उंगली से, बेटे-शिष्य और राजा को अंगूठे से तिलक करना चाहिए। तिलक के बाद चावल सिर पर नहीं डालना चाहिए, क्योंकि चावल में लक्ष्मी-नारायण का वास होता है।
स्वास्तिक : मंगल व समृद्धि का प्रतीक है। इसे जमीन पर नहीं बनाना चाहिए। हल्दी से बने स्वास्तिक से मंगल कार्य सिद्ध होते हैं, चंदन से शांति व समृद्धि आती है और ऐसा करने से भंडार की कभी कमी नहीं होती।
उन्होंने यह भी कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म न तो केवल कंस का वध करने के लिए हुआ था और न ही रासलीला के लिए, बल्कि उनका अवतार मुख्य रूप से गोपालन और गौ-सेवा के लिए हुआ। देसी गौ माता का पालन करना प्रत्येक भक्त का धर्म है। गाय के घी में स्वर्ण कण पाए जाते हैं, जिनसे पाप-दोष दूर होते हैं।
पं. अग्निहोत्री ने आगे बताया कि नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, धातुओं में सोना और धान में चावल को सर्वोत्तम माना गया है।
*56 भोग प्रसादी का वितरण*
संध्या छ: बजे आरती के साथ भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग अर्पित किए गए। इसके बाद प्रसादी वितरण किया गया। इस अवसर पर नगरवासियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु,मातृशक्ति उपस्थित रही और भक्तिभाव से कथा का रसपान किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन