Rajendra Devray / Sat, Mar 8, 2025 / Post views : 262

*नगर में शिव ,राम ,कृष्ण के फाग गीतों की धूम*
नालछा. इन दिनों युवा वर्ग जहा आधुनिकता और सोशल मीडिया की बयार मे बहकर धर्म और संस्कृति से दूर होता जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ जिले के नालछा नगर में एक अलग नजारा देखने को मिल रहा है। यहां पुरखों की प्राचीन परंपरा को कायम रखते हुए युवाओं ने संस्कृति को संजोने की बागडोर अपने हाथ में ले ली है। इन दिनों नालछा नगर की फिजाओं में होली के फाग गीत गूंज रहे हैं। स्थानीय युवाओं के धर्म और संस्कृति के प्रति प्रेम ने यहां होली के पर्व को कुछ खास बना दिया है और यहां होली अनोखे अंदाज में मनाई जा रही है।
भारत देश में फाग गायन की काफी प्राचीन परंपरा है फागुन की दस्तक के साथ ही इसकी शुरुआत हो जाती है। राधा कृष्ण फाग मंडली द्वारा बुजुर्गों की पुरानी परंपरा को जीवंत रखते हुए निराले अंदाज में इसका निर्वहन यहां किया जा रहा है।
युवा वर्ग दे रहे हैं फाग गायन का संदेश
नगर में करीब 20 युवाओं के द्वारा फाग गायन की परंपरा निभाई जा रही है शिवरात्रि पर्व से नगर में फाग गायन की शुरुआत होती है जो की अनवरत पूर्णिमा तक चलती है। प्रतिदिन नियत स्थान पर फाग गायन का आयोजन होता है। रात्रि 8:00 बजे से 12:00 बजे तक गायन का आयोजन रहता है। अधिकांश रूप से नगर के धार्मिक स्थान पर यह आयोजन होता है।
गीतों पर झूमते हैं श्रद्धालु,
फाग गीतों की स्वर लहरिया गूंजती है
नियत स्थान पर फाग गायन का आयोजन होता है देखते ही देखते इसमें 50 से अधिक बड़े बुजुर्ग भी शामिल हो जाते हैं और फाग गीतों पर जमकर श्रद्धालु झूमते हैं। वहीं रात्रि में फाग गीतों की स्वर लहरिया गूंजती है।
शिव ,राम ,कृष्ण के फाग गीतों की धूम
फाग गायन में मुख्य रूप से धार्मिक शीर्षक पर ही प्रस्तुतियां होती है।मुख्य रूप से इसमें शिव ,राम ,कृष्ण के फाग गीतों की धूम देर रात तक चलती है धार्मिक गीतों पर उत्साह के साथ श्रद्धालु शामिल होते हैं।
युवाओं ने दिया सकारात्मक संदेश सोशल मीडिया पर बना चर्चा का विषय
आधुनिकता के बदलते हुए दौर में जहां युवाओं ने फाग गायन का सकारात्मक संदेश दिया है वहीं दूसरी तरफ प्रतिदिन यहां होने वाले फाग गायन का सोशल मीडिया पर बहु प्रसारित हो रहा है। जो की काफी आकर्षण का केंद्र भी बना हुआ है। राधा कृष्ण फाग मंडली से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर में वर्षों पुरानी यहां परंपरा चली आ रही थी लेकिन बुजुर्गों की उम्र होने के कारण अब हम इस परंपरा को आगे निर्वहन कर रहे हैं जिसमें सभी का हमें सहयोग मिल रहा है।
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