: बड़वानी जेन समाज ने गणचार्य विराग सागर जी को दी विनयांजलि जैन समाज के बड़े आचार्यों में से एक लगभग 350 दीक्षा प्रदाता बड़े संघ के जन नायक 108 गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के महावीर शरण जालना में होजाने से जेन समाज मे शोक की लहर जगह जगह दी जारही है श्रद्धांजलि
गणचार्य विराग सागर जी को दी विनयांजलि
बड़वानी(निप्र) दिगंबर जैन समाज के बड़े आचार्यों में से एक लगभग 350 दीक्षा प्रदाता बड़े संघ के जन नायक 108 गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज की विगत दिवस मध्य रात्रि लगभग 2=30 बजे महाराष्ट्र के जालना नगर के पास देवमूर्ति ग्राम शिंडखेड के निकट संलेखना पूर्वक समाधि मरण हो गया है जिससे की समूचे जैन समाज और उनके अन्य समाज के भक्तो में शोक की लहर छा गई ,विगत दो दिवस पूर्व बिहार के दौरान आचार्य श्री का स्वास्थ्य खराब हुआ था और विगत दिवस अष्टमी के दिन उन्होंने अपनी नश्वर देह को त्याग दिया ,इस हेतु दिगंबर जैन समाज बड़वानी द्वारा खंडेलवाल दिगंबर जैन मंदिर में विनयांजलि और एक घंटे का नमोकार का पाठ रखा गया। जैन समाज की श्राविका 8 प्रतिमा धारी मंजुला जैन ने बताया की आचार्य श्री का दो दिवस पूर्व विहार के दौरान स्वास्थ्य खराब हुआ था उसी के दौरान उन्होंने अपने आचार्य पद का भी त्याग कर दिया था और अपने शिष्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी को अपना पट्टाधीश घोषित कर दिया था और सारे परिग्रह का भी त्याग कर रात्रि 2=30 पर समाधि को प्राप्त हुए ।
मनीष जैन ने बताया की विराग सागर जी महाराज का जन्म 2 मई 1963 को पथरिया जिला दमोह में हुआ था बचपन का नाम अरविंद था आचार्य श्री ने मात्र 17 वर्ष की उम्र में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी ने क्षुल्लक दीक्षा बुढार में 20 फरवरी 1980 को प्रदान की थी,और नाम रखा था क्षुल्लक पूर्ण सागर और मुनि दीक्षा वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज ने 9 दिसंबर 1992 को सिद्ध क्षेत्र द्रोणगिरी में प्रदान की थी आचार्य श्री ने अपने जीवन काल में लगभग 300 से अधिक दीक्षा प्रदान की जिसमे 9, आचार्य,89 मुनि,4 गणिनी,71 आर्यिका,5 एलक,23क्षुल्लक,29 क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की और सैकड़ों लोगों को ब्रह्मचर्य और अन्य श्रावक श्राविकाओ को मोक्ष मार्ग की राह पर लगाया ,आचार्य श्री ने अपने दीक्षा काल में 44 स्थानों पर 44 वर्षायोग चातुर्मास किए साथ ही अपने सभी शिष्यों के नाम वी अक्षर से ही रखे जो की अपने आप में एक इतिहास है,और अपनी माता श्यामा देवी और पिता कपूर चंद जी को भी आर्यिका और मुनि दीक्षा देकर समाधि करवाई ऐसे विरले ही होते है जो अपने पूरे परिवार और माता पिता का भी कल्याण करते है आचार्य श्री ने लौकिक शिक्षा के साथ शास्त्री की शिक्षा भी प्राप्त की और 4 अनुयोगो के ज्ञाता कई शास्त्र लिखे,और इस धरती के जीवों के कल्याण के लिए उनके दीक्षित श्रमण धर्म प्रभावना कर रहे है।आचार्य श्री की रिक्तता की पूर्ति कई वर्षो तक नहीं हो पाएगी।
जैन समाज अध्यक्ष जिनेन्द्र दोशी ने बताया की कुछ वर्षो पूर्व आचार्य श्री अपने विशाल संघ के साथ बड़वानी बावनगजा पधारे थे,बावनगजा ट्रस्ट अध्यक्ष विनोद दोशी बिन्नु भैया ने आचार्य श्री के इस समाधि मरण को सम्पूर्ण श्रमण संघ और जैन समाज ही नही मानव समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताया और बताया की आचार्य श्री बहोत वात्सल्य रखते थे ,उनकी पूर्ति करना बहुत मुश्किल है