Rajendra Devray / Sat, Sep 26, 2026 / Post views : 133
संपादकीय प्रधान संपादक राजेन्द्र देवराय गुरव रत्न की कलम से :
लोकतंत्र की कसौटी पर आयोग—आरोप, आंदोलन और जवाबदेही की परीक्षा जनता वास्तविकता जानना चाहती हैं
देश का लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता से संचालित होता है जो चुनाव प्रक्रिया को संचालित करती हैं।

ऐसे में जब वर्तमान चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष सड़कों पर उतर आए, इस्तीफे की मांग तेज हो जाए और विभिन्न राजनीतिक दल आंदोलन की चेतावनी देने लगें, तो यह महज एक व्यक्ति का मुद्दा नहीं रह जाता—यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख का सवाल बन जाता है।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
आयोग की कार्यप्रणाली और निर्णयों को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ रहा है।
विरोध प्रदर्शन और धरनों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि चुनाव प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार का संदेह लोकतंत्र के लिए घातक है।

खासकर जब “कॉकरोच पार्टी” जैसे नामों से जुड़े समूह भी आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि असंतोष का दायरा व्यापक होता जा रहा है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में यह भी जरूरी है कि आरोपों और विरोध के बीच तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं का संतुलन बना रहे।
चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन आरोपों को प्रमाणित करना उतना ही आवश्यक है।
बिना ठोस आधार के लगातार अविश्वास का माहौल बनाना भी लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है।

दूसरी ओर, आयोग की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।
उसे पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के उच्चतम मानकों पर खरा उतरना होगा।
यदि किसी भी निर्णय या प्रक्रिया पर संदेह पैदा हो रहा है, तो उसे स्पष्ट और ठोस तरीके से जवाब देना चाहिए।
जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
वर्तमान परिस्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि राजनीतिक दल अपने विरोध को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रखें और संस्थाओं की गरिमा बनाए रखें।
वहीं चुनाव आयोग को भी यह समझना होगा कि आज के दौर में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं है,
बल्कि निष्पक्ष दिखना भी उतना ही जरूरी है।
अंततः, यह पूरा विवाद विपक्ष केलिए एक अवसर भी है
लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मजबूत बनाने का, पारदर्शिता बढ़ाने का और जनता के विश्वास को और गहरा करने के लिए चुनाव आयोग को सामने आकर के अपनी बात रखनी चाहिए चुनाव आयोग इसमें जितनी देर करेगा विपक्षी पार्टी का आंदोलन उतना ही सरकार को तेज होगा इसलिए समय रहते ही ज्ञानेश कुमार को अपनी बात कहने के लिए सामने आना ही पड़ेगा
वैसे नियमों के अनुसार ज्ञानेश कुमार को हटाना विपक्ष के लिए इतना आसान भी नहीं है लेकिन विपक्ष का जो विरोध करने का तरीका है और कॉकरोच पार्टी का इवेलुएशन अंततः ज्ञानेश कुमार के स्थिति का भविष्य में कारण जरूर बनेगा
लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि वह सवालों से भागता नहीं, बल्कि उनका सामना करता है।
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