Rajendra Devray / Tue, Sep 22, 2026 / Post views : 115
सूरज के तप में और गुरु के तप में अंतर होता है - आर्यिका सुप्रज्ञ मति माताजी
पर्व राज पर्यूषण का सातवां दिवस - उत्तम तप
बड़वानी(निप्र) सूरज भी तपता ह है और गुरु भी तपते है और दोनों की तपन में अंतर होता है सूर्य की तपन हम सहन नहीं कर पाते और गुरु का तप हमे सन्मार्ग पर लगाता है और जीवन का उद्धार होता है उपरोक्त उद्गार परम पूज्य चतुर्थ पट्टाचार्य श्री सुनील जी महाराज की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञ मति माताजी ने दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे पर्यूषण पर के सातवें दिन आज एकादशी उत्तम तप के दिवस पर बोलते हुए कही, माताजी ने बताया कि सूरज भी तपता है और गुरु भी तपते है सूरज तो केवल 12 घंटे तक तपता है पर हमारे गुरु तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज तो 50 साल तक तपे , तप की भी अपनी महिमा है आर्यिका मां ने आचार्य सन्मति सागर जी का सम्मेद शिखर जी का उदाहरण देते हुए बताया कि आचार्य श्री सम्मेद शिखर जी की तेरह पंथी कोठी में विराजित थे और जिन कमरों में मुनि संघ को ठहराया था वहां

बहुत मच्छर थे ,तब संघ के मुनिराज ने सोचा कि आचार्य महाराज को देखे वो कहा विश्राम कर रहे,वहां ऐसा लग रहा था जैसे कोई काला कालीन बिछा रखा है ,जबकि गुरुदेव को चटाई का भी त्याग था और गुरु देव के पूरे शरीर पर मच्छरों से पटा हुआ था,महाराज ने बगैर हिले उन मच्छरों का उपसर्ग सहन करते रहे धन्य है आचार्य श्री जो कि इतना कष्ट और पीड़ा सह गए ,माताजी ने बताया कि तप 2 प्रकार का होता है अंतरंग और बाह्य और दोनों के 6/6 भेद होते है,

बाह्य तप के प्रायश्चित अपनी गलतियों और पाप का पश्चाताप, विनय बड़े,और गुरुजन, विद्वान के प्रति आदर,सम्मान होना चाहिए, वैयावृत्ति गुरु,संतो की सेवा करना,स्वाध्याय धार्मिक ग्रंथों का वाचन और स्वाध्याय करना और उसे अपने अंदर उतरना चाहिए,ध्यान मन को एकाग्र चित्त कर अपने में मन में चिंतन करना अपनी आत्मा के प्रदेश में चिंतन करना,व्युत्सर्ग शरीर के प्रति आसक्ति कम करना मोह, ममता आदि का त्याग करना।
बाह्य तप अनशन भोजन का त्याग करना उपवास करना,फाका करना , उनोदर तप याने भूख से कम खाना,वृत्ति परिसंख्यानं आहार के लिए विधि या नियम ले कर निकलना,रस परित्याग ,घी,दूध,शक्कर,नमक आदि स्वादिष्ट छहों रसों का त्याग करना, काय क्लेश शरीर को सहन शील बनाना,कष्ट सहना,प्रति संलिनता इंद्रियों,कषायों पर नियंत्रण करना, रोकना ,तप इच्छाओ के निरोध के लिए करना चाहिए आचार्य श्री सन्मति सागर जी का दृष्टांत दिया और बताया कि तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महा मुनिराज ने केवल मूंग की दाल के पानी पर सम्मेद शिखर जी की 108 वंदना की थी ये सब उनके तपोबल की शक्ति से ही हो पाया वरना सामान्य मनुष्य की तो ऐसी शक्ति नहीं ,माताजी ने कहा कि जब तक तुम्हे आत्मानुभूति नहीं होती आपको देव,शास्त्र गुरु का सहारा लेना चाहिए ,जिनवाणी कहती है हर व्यक्ति को अनंत अनंत गुण है जो है अपने पास है भगवान किसी को कुछ नहीं देते और ना ही किसी से कुछ लेते है ,आप जब तक तप नहीं करोगे आपको कुछ प्राप्त नहीं होगा आराम करने वालो को बगैर तप किए कल्याण नहीं होता ,देव शास्त्र गुरु साधन है आप तप करोगे तो निखर जाओगे, बिना देशना , लब्धि के सम्यक्त्व नहीं हो सकता और देव,शास्त्र गुरु के बगैर आपका उद्धार नहीं हो सकता
उसके पूर्व प्रातः पूज्य माताजी के सानिध्य में भगवान के शांतिधारा,अभिषेक, आरती,पूजन,विधान की पूजन पूज्य आर्यिका माताजी के मुखारविन्द सम्पन्न हुई ।सभी समाज जन बहुत ही भक्ति भाव पूर्वक पूजन,अभिषेक शांतिधारा ने बढ़ चढ़ कर शामिल हो रहे है ।
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